किडनी फ़ैल, कारण, लक्षण, निदान और उपचार – Kidney failure, Symptoms, Causes, Diagnosed and Treatment in hindi

किडनी फ़ैल, कारण, लक्षण, निदान और उपचार - Kidney failure, Symptoms, Causes, Diagnosed and Treatment in hindi
Written by Shivam

किडनी कैसे काम करती है – How does kidney work in hindi

  • किडनी एक बेहद पेचीदा अंग है. इसकी रचना में लगभग तीस तरह की विभिन्न कोशिकाएं लगती हैं. यह बेहद ही पतली नलियों का अत्यंत जटिल जाल  है जो हमारे रक्त से निरंतर ही पानी, सोडियम, पोटैशियम तथा ऐसे अनगिनत पदार्थों को साफ करके पेशाब के जरिए बाहर करता रहता है।
  • यह फिल्टर इस मामले में अद्भुत है कि यहां से जो भी छनकर नली में नीचे आता है उसे Kidney आवश्यकतानुसार वापस रक्त में खींचती भी रहती है, और ऐसी पतली फिल्ट्रेशन नलियों की तादाद लाखो में होती है एक गुर्दे में ढाई लाख से लगाकर नौ लाख तक नेफ्रान या नलियां रहती हैं. हर मिनट लगभग एक लीटर खून इनसे  गुजरता है ताकि किडनी इस खून को साफ कर सके. दिन में लगभग डेढ़ हजार लीटर खून की सफाई होती रहती है. और गुर्दे केवल यही काम नहीं करते बल्कि यह तो उसके काम का केवल एक पक्ष है, जिसके बारे में थोड़ा-थोड़ा पता सामान्यजनों को भी है परंतु क्या आपको ज्ञात है कि किडनी का बहुत बड़ा रोल प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड (शक्कर आदि) तथा फैट (चर्बी) की मेटाबोलिज्म (पाचन/ चय-अपचय) में भी है. इसलिए किडनी खराब होने पर कुपोषण के लक्षण हो सकते हैं हार्मोंस के प्रभाव में भी गुर्दों का अहम रोल है. इंसुलिन, विटामिन डी, पेराथायरायड आदि के प्रभाव को गुर्दे की बीमारी बिगाड़ सकती है।
  • शरीर में रक्त बनाने की सारी प्रक्रिया में गुर्दों का बेहद अहम किरदार है. गुर्दे में बनने वाला इरिथ्रोपोइरिन नामक पदार्थ खून बनाने वाली बोनमैरो को (बोनमैरो को आप हड्डियों में खून पैदा करने वाली फैक्टरी कह सकते हैं) खून बनाने के लिए स्टीम्यूलेट करता है. यह न हो तो शरीर में खून बनना बंद या कम हो जाता है, किडनी फेल होने वाले मरीज पेशाब की शिकायत या सूजन आदि के अलावा और भी कई तरह से सामने आ सकता है.
  • सवाल यह है कि हमें कब सतर्क होकर Kidney का टेस्ट कराना चाहिए. कौन-से लक्षण हैं जो किडनी फेल्योर की ओर इंगित कर सकते हैं?
  • हमारी किडनी शरीर में संतुलन बनाए रखने के कई कार्यों का निष्पादन करती हैं। वे अपशिष्ट उत्पादों को फिल्टर करके पेशाब से बहार निकालते हैं वे शरीर में पानी की मात्रा, सोडियम, पोटेशियम और कैल्शियम की मात्रा (इलेक्ट्रोलाइट्स) को संतुलित करते हैं। वह अतिरिक्त अम्ल एवं क्षार निकालने में मदद करते हैं जिससे शरीर में एसिड एवं क्षार का संतुलन बना रहता है।
  • शरीर में किडनी का मुख्य कार्य खून का शुद्धीकरण करना है। जब बीमारी के कारण दोनों किडनी अपना सामान्य कार्य नहीं कर सके, तो किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है, जिसे हम किडनी फेल्योर(failure) कहते हैं।

किडनी फेल्योर (Kidney failure) : किडनी फेल होने की जांच कैसे होती है How is kidney failure diagnosed in hindi

  • खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा की जाँच से किडनी की कार्यक्षमता की जानकारी मिलती है। चूंकि किडनी की कार्यक्षमता शरीर की आवश्यकता से अधिक होती है। इसलिए यदि किडनी की बीमारी से थोड़ा नुकसान हो जाए, तो भी खून के परीक्षण में कई त्रुटि देखने को नहीं मिलती है। परन्तु  जब रोगों के कारण दोनों किडनी 50 प्रतिशत से अधिक ख़राब हो गई हो, तभी खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा सामान्य से अधिक पाई जाती है।
  • क्या एक किडनी खराब होने से किडनी फेल्योर हो सकता है नहीं, यदि किसी व्यक्ति की दोनों स्वस्थ किडनी में से एक किडनी खराब हो गई हो या उसे शरीर से किसी कारणवश निकाल दिया गया हो, तो भी दूसरी किडनी अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाते हुए शरीर का कार्य पूर्ण रूप से कर सकती है।

किडनी फेल होने के दो मुख्य प्रकार है :

  • एक्यूट किडनी फेल्योर और क्रोनिक किडनी फेल्योर। इन दो प्रकार के किडनी फेल्योर के बीच का अंतर स्पष्ट मालूम होना चाहिए।
  1. एक्यूट किडनी फेल्योर :  एक्यूट किडनी फेल्योर में सामान्य रूप से काम करती दोनों किडनी विभिन्न रोगों के कारण नुकसान होने के बाद अल्प अवधि में ही काम करना कम या बंद कर देती है| यदि इस रोग का तुरन्त उचित उपचार किया जाए, तो थोड़े समय में ही किडनी संपूर्ण रूप से पुन: काम करने लगती है और बाद में मरीज को दवाइ या परहेज की बिलकुल जरूरत नहीं रहती| एक्यूट किडनी फेल्योर के सभी मरीजों का उपचार दवा और परहेज द्वारा किया जाता है |कुछ मरीजों में अल्प (कुछ दिन के लिए) डायालिसिस की आवश्यकता होती है|
  2. क्रोनिक किडनी फेल्योर : क्रोनिक किडनी फेल्योर (क्रोनिक किडनी डिजीज – CKD) में अनेक प्रकार के रोगों के कारण किडनी की कार्यक्षमता क्रमशः महीनों या वर्षों में कम होने लगती है और दोनों किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं| वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में क्रोनिक किडनी फेल्योर को ठीक या संपूर्ण नियंत्रण करने की कोई दवा उपलब्ध नहीं है| क्रोनिक किडनी फेल्योर के सभी मरीजों का उपचार दवा, परहेज और नियमित परीक्षण द्वारा ठीक किया जाता है| शुरू में उपचार हेतु कमजोर किडनी की कार्यक्षमता को बचाए रखना, किडनी फेल्योर के लक्षणों को काबू में रखना और संभावित खतरों की रोकथाम करना है| इस उपचार का उद्देश्य मरीज के स्वास्थ्य को संतोषजनक रखते हुए, डायालिसिस की अवस्था को यथासंभव टालना है| किडनी ज्यादा खराब होने पर सही उपचार के बावजूद रोग के लक्षण बढ़ते जाते हैं और खून की जाँच में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा अधिक बढ़ जाती है, ऐसे मरीजों में सफल उपचार के विकल्प सिर्फ डायालिसिस और किडनी प्रत्यारोपण है|
  3. नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम : नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक आम किडनी की बीमारी है। पेशाब में प्रोटीन का जाना, रक्त में प्रोटीन की मात्रा में कमी, कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर और शरीर में सूजन इस बीमारी के लक्षण हैं। किडनी के इस रोग की वजह से किसी भी उम्र में शरीर में सूजन हो सकती है, परन्तु मुख्यतः यह रोग बच्चों में देखा जाता है। उचित उपचार से रोग पर नियंत्रण होना और बाद में पुनः सूजन दिखाई देना, यह सिलसिला सालों तक चलते रहना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की विशेषता है। लम्बे समय तक बार-बार सूजन होने की वजह से यह रोग मरीज और उसके पारिवारिक सदस्यों के लिए एक चिन्ताजनक  रोग है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी पर क्या कुप्रभाव पडता है?

सरल भाषा में यह कहा जा सकता है की किडनी शरीर में छन्नी का काम करती है, जिसके द्वारा शरीर के अनावश्यक उत्सर्जी पदार्थ अतिरिक्त पानी पेशाब द्वारा बाहर निकल जाता है।

  • नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी के छन्नी जैसे छेद बड़े हो जाने के कारण अतिरिक्त पानी और उत्सर्जी पदार्थों के साथ-साथ शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन भी पेशाब के साथ निकल जाता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में सूजन आने लगती है।
  • पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की मात्रा के अनुसार रोगी के शरीर में सूजन में कमी या वृध्दि होती है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन होने के बाद भी किडनी की अनावश्यक पदार्थों को दूर करने की कार्यक्षमता यथावत बनी रहती है अर्थात किडनी ख़राब होने की संभावना बहुत कम रहती है।

 नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम किस कारण से होता है What causes nephrotic syndrome?

  • नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाया है। ऐसी मान्यता है कि श्वेतकणों में लिम्फोसाइट्स के कार्य की खामी (Auto Immune Disease) के कारण यह रोग होता है । आहार में परिवर्तन या दवाइँ को इस रोग के लिए जिम्मेदार मानना बिलकुल गलत मान्यता है।
  • इस बीमारी के 90% मरीज बच्चे होते हैं जिनमें नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाता है। इसे प्राथमिक या इडीओपैथिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम भी कहते हैं।(सामान्यतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम दो से आठ साल की उम्र के बच्चों में ज्यादा पाया जाता है।)
  • प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम चार महत्वपूर्ण पैथोलाजिकल रोगों के कारण हो सकता है। मिनीमल चेन्ज डिजीज (MCD), फोकल सेग्मेंन्टल ग्लोमेरुलोस्केलेरोसिस (FSGS), मेम्ब्रेनस नेफ्रोपेथी और मेम्ब्रेनोप्रोलिफरेटिव ग्लोमेंरुलो नेफ्राइटिस (MPGN)। प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का एक विशेष उपचार है जिससे सेकेंडरी करणों को एक-एक कर हटाने के बाद ही इनका इलाज  होता है।
  • इसके 10 % से भी कम मामलों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम वयस्कों में अलग-अलग बीमारियों/करणों की वजह से हो सकता है। जैसे संक्रमण, किसी दवाई से हुआ नुकसान, कैंसर, वंशानुगत रोग, मधुमेह, एस. एल. ई. और एमाइलॉयडोसिस आदि में यह सिंड्रोम उपरोक्त बीमारियों के कारण हो सकता है।
  • एम. सी. डी. अर्थात् मिनीमल चेन्ज डिजीज, बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का सबसे आम कारण है। यह रोग 35 प्रतिशत छोटे बच्चों में (छः साल की उम्र तक) और 65 % मामलों में बड़े बच्चों में इडियोपैथिक (बिना किसी कारण) नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होता है।
  • एम. सी. डी. (मिनीमल चेन्ज डिजीज) के रोगी में रक्तचाप सामान्य रहता है, लाल रक्त कोशिकाएं, पेशाब में अनुपस्थित रहती है और सीरम क्रीएटिनिन और कॉम्प्लीमेंट C3 / C4 के मूल्य सामान्य रहते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सभी कारणों में एम. सी. डी सबसे कम खराब बीमारी है। 90 % रोगी स्टेरॉयड उपचार से ही ठीक हो जाते हैं

 नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मुख्य लक्षण Main symptoms of nephrotic syndrome

  1. यह रोग मुख्यतः दो से छः साल के बच्चों में दिखाई देता है। अन्य उम्र के व्यक्तियों में इस रोग की संख्या बच्चों की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है।
  2. आमतौर पर इस रोग की शुरुआत बुखार और खाँसी के बाद होती है।
  3. रोग की शुरुआत के खास लक्षणों में आँखों के नीचे एवं चेहरे पर सूजन दिखाई देती है। आँखों पर सूजन होने के कारण कई बार मरीज सबसे पहले आँख के  डॉक्टर के पास जाँच के लिए जाते हैं।
  4. यह सूजन जब मरीज सुबह सोकर उठता है तब ज्यादा दिखती है, जो इस रोग की पहचान है। यह सूजन दिन के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे कम होने लगती है और शाम तक बिलकुल कम हो जाती है।
  5. रोग के बढ़ने पर पेट फूल जाता है, पेशाब कम होता है, पुरे शरीर में सूजन आने लगती है और वजन बड़ जाता है।
  6. कई बार पेशाब में झाग आने और जिस जगह पर पेशाब किया हो, वहाँ सफेद दाग दिखाई देने की शिकायत होती है।
  7. इस रोग में लाल पेशाब होना, साँस फूलना अथवा खून का दबाव बढ़ना जैसे कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं।
  8. इसमें कौन से गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं?
  9. इसमें जो संभावित जटिलताएं होती है, जल्दी संक्रमण होना, नस में रक्त के थक्के जमना (डीप वेन थ्रोम्बोसिस), रक्ताल्पता, बढ़े हुए कोलेस्ट्रोल और ट्राइग्लिसराइड्स के कारण ह्रदय रोग होना, किडनी खराब होना आदि महत्वपूर्ण है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान Diagnosis of nephrotic syndrome

  • उन रोगियों में, जिन्हें शरीर में सूजन है उनके लिए पहला चरण है नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान करना। प्रयोगशाला परीक्षण से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
  • पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना।
  • रक्त में प्रोटीन स्तर कम होना।
  • कोलेस्ट्रोल के स्तर का बढ़ा होना।

1. पेशाब की जाँच-urine test

  • मूत्र में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान की सबसे महत्वपूर्ण निशानी है।
  • यूरिन में श्वेतकणों, रक्तकणों या खून का नहीं जाना इस रोग के निदान की महत्वपूर्ण निशानी है।
  • 24 घण्टों में पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की कुल मात्रा 3 ग्राम से अधिक होती है।
  • 24 घंटे में शरीर से जो प्रोटीन कम हुआ है, उसका अनुमान 24 घंटे का पेशाब का संग्रह करके लगाया जा सकता है। इससे भी ज्यादा सरल है स्पॉट प्रोटीन/क्रीएटिनिन रेश्यो। इन परीक्षणों से प्रोटीन के नुकसान की मात्रा का सटीक माप प्राप्त होता है। इन परीक्षणों से पता चलता है की प्रोटीन का नुकसान हल्की, मध्यम या भारी मात्रा में हुआ है। इसके निदान के अलावा 24 घंटे की पेशाब में संभावित प्रोटीन की जाँच से इस बीमारी में उपचार के पश्चात् कितना सुधार हुआ है, यह भी जाना जा सकता है। उपचार के लिए इस पर नजर रखना अति उपयोगी है।पेशाब की जाँच सिर्फ रोग के निदान के लिए नहीं परन्तु रोग के उपचार कर नियमन के लिए भी विशेष महत्वपूर्ण है। पेशाब में जानेवाला प्रोटीन यदि बंद हो जाए, तो यह उपचार की सफलता दर्शाता है।

 2. खून की जाँच Blood tests

  • सामान्य जाँच : अधिकांश मरीजों में हीमोग्लोबिन, श्वेतकणों की मात्रा इत्यादि की जाँच आवश्कतानुसार की जाती है।
  • निदान के लिए जरुरी जाँच: नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान के लिये खून की जाँच में प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) कम होना और कोलेस्ट्रोल बढ़ जाना आवश्यक है। सामान्यतः खून की जाँच क्रीएटिनिन की मात्रा सामान्य पाई जाती है।
  • अन्य विशिष्ट जाँच: डॉक्टर द्वारा आवश्कतानुसार कई बार करायी जानेवाली खून की विशिष्ट जाँचों में कोम्पलीमेंट, ए. एस. ओ. टाइटर, ए. एन. ए. टेस्ट, एड्स की जाँच, हिपेटाइटिस – बी की जाँच वगैरह का समावेश होता है

3. रेडियोलॉजिकल जाँच- Radiological examination

एसे परीक्षण में पेट और किडनी की सोनोग्राफी, छाती का एक्सरे वगैरह शामिल होते हैं। किडनी की बायोप्सीनेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सही कारण और अंर्तनिहित प्रकार को पहचानने में किडनी की बायोप्सी सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। किडनी बायोप्सी में किडनी के ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में इसकी माइक्रोस्कोप द्वारा जाँच की जाती है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का उपचार- Treatment of nephrotic syndrome

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपचार का लक्ष्य है मरीज को लक्षणों से राहत दिलवाना, पेशाब में जो प्रोटीन का नुकसान हो रहा है, उसमें सुधार लाना, जटिलताओं को रोकना और उनका इलाज करना और किडनी को बचाना है। इस रोग का उपचार आमतौर पर एक लंबी अवधि या कई वर्षों तक चलता है।

शरीर में सूजन, पेशाब में प्रोटीन, खून में कम प्रोटीन और कोलेस्ट्रोल का बढ़ जाना नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की निशानी है।पेशाब की जाँच नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान और उपचार के नियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।संक्रमण की वजह से नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन बार-बार हो सकती है, इसलिए संक्रमण न होने की सावधानी महत्वपूर्ण है

  1. आहार में परहेज करना : सुजन हो और पेशाब कम आ रहा हो, तो मरीज को कम पानी और कम नमक लेने की सलाह दी जाती है। अधिकांश बच्चों को प्रोटीन सामान्य मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।
  2. आहार में सलाह : मरीज के लिए आहार में सलाह या प्रतिबंध लगाते जाते हैं वो विभिन्न प्रकार के होते हैं। प्रभावी उपचार एवं उचित आहार से सूजन खत्म हो जाती है।
  3. सूजन कि मौजुदगी में : उन मरीजों को जिन्हें शरीर में सूजन है, उन्हें आहार में नमक में कमी और टेबल नमक में प्रतिबंध और वह भोज्य सामग्री जिसमें सोडियम की मात्रा अधिक हो, उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जिससे शरीर में सूजन और तरल पदार्थों को शरीर में जमा होने से रोका जा सके। वैसे इस बीमारी में तरल पदार्थों पर प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं होती|
  4. सूजन न होने वाले मरीज : जिन रोगियों को प्रतिदिन स्टेरॉयड की उच्च मात्रा की खुराक मिलती है, उन्हें नमक की मात्रा सिमित करनी चाहिए जिससे रक्तचाप बढ़ने का जोखिम न हो । जिन मरीजों को सूजन है उन्हें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दिया जाना चाहिए जिससे प्रोटीन का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई हो सके और कुपोषण से बचाया जा सके। पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और विटामिन्स भी मरीजों को देना चाहिए।

लक्षण मुक्त मरीज (Remission)- Symptom-free patient

  1. लक्षण मुक्त अवधि के दौरान सामान्य, स्वस्थ आहार लेने की सलाह दी जाती है।
  2. आहार पर अनावश्यक प्रतिबंध हटाना चाहिए। नमक और तरल पदार्थ का प्रतिबंध न रखें। मरीज को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दें।
  3. अगर किडनी डिजीज है तो प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखें। रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने के लिए आहार में वसा का सेवन कम करें।

 संक्रमण का उपचार एवं रोकथाम-Treatment and prevention of infection:

  • नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का विशेष उपचार शुरू करने से पहले बच्चे को यदि किसी संक्रमण की तकलीफ हो, तो ऐसे संक्रमण पर नियंत्रण स्थापित करना बहुत ही आवश्यक है।
  • नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चों को सर्दी, बुखार एवं अन्य प्रकार के संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है।
  • उपचार के दौरान संक्रमण होने से रोग बढ़ सकता है। इसलिए उपचार के दौरान संक्रमण न हो इसके लिए पूरी सावधानी रखना तथा संक्रमण होने पर तुरंत सघन उपचार कराना अत्यंत आवश्यक है।

1.दवाइँ द्वारा उपचार- Treatment by medicines: treatment by specific medication

  • स्टेरॉयड चिकित्सा:नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में लक्षण मुक्त करने के लिए प्रेडनिसोलोन एक मानक उपचार है। अधिकांश बच्चों पर इस दवा का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 1 से 4 हफ्ते में सूजन और पेशाब में प्रोटीन दोनों गायब हो जाते हैं। पेशाब जब प्रोटीन से मुक्त हो जाये तो उस स्थिति को रेमिषन कहते हैं।
  •  वैकल्पिक चिकित्सा : बच्चों का एक छोटा समूह जिन पर स्टेरॉयड चिकित्सा का अनुकूल प्रभाव नहीं हो पाता, उनकी पेशाब में प्रोटीन की मात्रा लगातार बढ़ती रहती है। ऐसे में किडनी की आगे की जाँच की आवश्यकता होती है जैसे – किडनी की बायोप्सी। उन्हें लीवामिजोल, साइक्लोफॉस्फेमाइड, साइक्लोस्पेरिन, टेक्रोलीमस, माइकोफिनाइलेट आदि वैकल्पिक दवा दी जाती है। स्टेरॉयड के साथ-साथ वैकल्पिक दवा भी दी जाती है। जब स्टेरॉयड की मात्रा कम कर दी जाती है तो ये दवा रेमिषन को बनाये रखने में सहायक होती है।
  • नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज बच्चे अन्य संक्रमणों से ग्रस्त हो सकते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में संक्रमण की रोकथाम, उसका जल्दी पता लगाना और उनका उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि संक्रमण, नियंत्रित बीमारी को बढ़ा सकती है (तब भी जब मरीज का इलाज चल रहा हो)।
  • संक्रमण से बचने के लिए परिवार और बच्चे को साफ पानी पिने की और पूरी सफाई से साथ धोने की आदत डालनी चाहिए। भीड़ भरे इलाके संक्रामक रोगियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
  • जब स्टेराइड का कोर्स पूरा हो चूका हो तब नियमित टीकाकरण की सलाह देनी चाहिए।

निगरानी और जाँच करना – Monitoring and checking

  • संभवतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक लम्बे समय तक (कई वर्षों) तक रहता है। इसलिए यह आवश्यक है की डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी नियमित जाँच पड़ताल होनी चाहिए। जाँच के दौरान डॉक्टर के द्वारा मरीज के पेशाब में प्रोटीन की हानि, वजन रक्तचाप, दवा के दुष्प्रभाव और किसी भी प्रकार की जटिलता का मूल्यांकन किया जाता है।

मरीज को अपना वजन लेकर उसका रिकार्ड रखना चाहिए। वजन चार्ट, शरीर में पानी की मात्रा में वृध्दि या कमी पर नजर रखने में मदद करता है।

  • परिवार को नियमित रूप से घर में, प्रोटीन के लिए पेशाब परीक्षण करना सीखना चाहिए। इसके अलावा सभी पेशाब परीक्षण, उसके परिणाम और सभी दवाओं के विवरण और खुराक की विस्तृत जानकारी डायरी में रखने के लिए सिखाया जाना चाहिए। इससे बीमारी के पुनः बढ़ने का पहले से ही पता चल जाता है जो इलाज के लिए सहायक होता है।

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