घेंघा रोग क्या है, गोइटर के प्रकार, लक्षण, कारण और इलाज – What is Goitre (Kennel disease) in Hindi

घेंघा रोग क्या है, गोइटर के प्रकार, लक्षण, कारण और इलाज - What is Goitre (Kennel disease), Types, Symptoms, Causes, Treatment in hindi
Written by Sourabh

Goitre in hindi घेंघा रोग (गोइटर), थायरॉयड से संबन्धित समस्या है, जिसका मुख्य कारण आयोडीन की कमी को माना जाता है। यह समस्या थायरॉयड ग्रंथि में वृद्धि के साथ-साथ गांठ और सूजन का कारण भी बनती है। घेंघा रोग के अनेक कारण हो सकते हैं, जिनका निदान समय पर किया जाना आवश्यक होता है। भारत में प्रति वर्ष 1 मिलियन से अधिक घेंघा रोग के मामले सामने आते हैं।  घेंघा रोग से बचाव के लिए घेंघा रोग से संबन्धित समस्त जानकारी प्राप्त होना आवश्यक होता है। आज इस लेख के माध्यम से आप जानेंगे कि घेंघा रोग (गोइटर) क्या है, गोइटर के प्रकार, लक्षण, कारण, इलाज और घरेलू इलाज के बारे में।

  1. घेंघा रोग (गोइटर) क्या है – What is Goitre (Kennel disease) in hindi
  2. घेंघा रोग (गोइटर) के प्रकार – Types of Goiters in hindi
  3. घेंघा रोग के लक्षण – Goiters Symptoms in hindi
  4. घेंघा रोग (गण्डमाला) के कारण – Goiters Causes in hindi
  5. घेंघा रोग (गोइटर) का निदान – Goiters Diagnosis in hindi
  6. घेंघा रोग के जोखिम कारक – Goiters Risk factor in hindi
  7. घेंघा रोग का इलाज – Goiters Treatment in hindi
  8. घेंघा रोग के लिए घरेलू देखभाल – Goiters Home Care in hindi

घेंघा रोग (गोइटर) क्या है – What is Goitre (Kennel disease) in hindi

घेंघा रोग (गोइटर) क्या है – What is Goitre (Kennel disease) in hindi

घेंघा रोग, थायरॉयड ग्रंथि में असामान्य रूप से होने वाली वृद्धि से संबंधित विकार है। घेंघा रोग को गोइटर या गण्डमाला कहा जाता है। यह रोग, बढ़े हुए थायरॉयड ग्रंथि के परिणामस्वरूप गर्दन में सूजन उत्पन्न होने का कारण भी बनता है। एक गोइटर आमतौर पर दर्द रहित होता है, इसके अतिरिक्त थायरॉयड ग्रंथि में अत्यधिक वृद्धि खांसी का कारण बनने के साथ-साथ खाना निगलने या सांस लेने में मुश्किल पैदा कर सकती है। थायरॉयड एक तितली के आकार की ग्रंथि है, जो एडम एप्पल के ठीक नीचे की ओर गर्दन के आधार पर स्थित होती है। इस थायरॉयड ग्रंथि में अनेक प्रकार से वृद्धि हो सकती है, जिसके कारण थायराइड ग्रंथि बहुत अधिक या बहुत कम मात्रा में थायरोक्सिन (टी-4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (टी-3) का उत्पादन कर सकती है।

दुनिया भर में घेंघा रोग (गोइटर) के 90% से भी अधिक मामलों का सबसे मुख्य कारण आहार में आयोडीन की कमी का होना है। एक गण्डमाला या घेंघा रोग किसी को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह महिलाओं में अधिक आम है। घेंघा रोग का उपचार उसके आकार, लक्षणों की गंभीरता और अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करता है। घेंघा रोग एक अस्थायी समस्या के रूप में भी विकसित हो सकता है, जो समय के साथ बिना चिकित्सकीय उपचार के दूर हो सकता है। यदि घेंघा रोग दिखाई नहीं देता है और किसी भी प्रकार के लक्षणों का कारण नहीं बनता है, तब इस स्थिति में उपचार की आवश्यकता नहीं होती है।

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घेंघा रोग (गोइटर) के प्रकार – Types of Goiters in hindi

गोइटर अनेक प्रकार का हो सकता है, जिसमें शामिल है:

कोलाइड (स्थानिक) गोइटर – Colloid (Endemic) Goiter in hindi

कोलाइड (स्थानिक) गोइटर – Colloid (Endemic) Goiter in hindi

कोलाइड गोइटर आयोडीन की कमी के कारण उत्पन्न होता है। आयोडीन एक आवश्यक खनिज है जो मानव शरीर में थायराइड हार्मोन का उत्पादन करता है। कोलाइड गोइटर की समस्या उस क्षेत्र के व्यक्तियों को अधिक प्रभावित करती है, जहाँ आयोडीन की खपत बहुत कम है या फिर जहाँ आयोडीन की प्राप्ति बहुत दुर्लभ है।

नॉनटॉक्सिक गोइटर – Nontoxic Goiter in hindi

समान्यतः नॉनटॉक्सिक गोइटर का मुख्य कारण अज्ञात है, हालांकि इस प्रकार का घेंघा रोग लिथियम (lithium) जैसी दवाओं के सेवन के कारण हो सकता है। लिथियम जैसी दवाओं का उपयोग मानसिक रोग जैसे बाइपोलर डिसऑर्डर (bipolar disorder), के इलाज के लिए किया जाता है। नॉनटॉक्सिक गोइटर (Nontoxic goiters) की स्थिति में थायराइड हार्मोन का उत्पादन अप्रभावित रहता है। नॉनटॉक्सिक गोइटर एक सौम्य प्रकृति के होते हैं।

विषाक्त गांठदार या मल्टीनोडुलर गोइटर – Toxic Nodular or Multinodular Goiter in hindi

विषाक्त गांठदार या मल्टीनोडुलर गोइटर की स्थिति में थायरॉयड के दोनों किनारों पर ठोस या तरल पदार्थ से भरी छोटी गांठें (नोड्यूल्स) विकसित होती हैं, जो आपस में मिलकर बड़े गोइटर का निर्माण करते हैं। यह स्थिति हाइपरथायरायडिज्म (hyperthyroidism) का कारण बनती है। यह घेंघा रोग का आम प्रकार है। मल्टीनोडुलर गोइटर में गांठो (नोड्यूल) के विकसित होने की दर अलग-अलग होते हैं, तथा इस प्रकार का गोइटर धीरे-धीरे बढ़ता है।

डिफ्यूज़ गोइटर – Diffuse goiter in hindi

डिफ्यूज़ गोइटर संपूर्ण थायराइड में वृद्धि होने के कारण विकसित होता है। इस प्रकार के घेंघा रोग का कारण हाइपरप्लासिया (Hyperplasia) होता है, जिसमें किसी अंग या ऊतक के भीतर कोशिकाओं की अत्याधिक वृद्धि हो सकती है।

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घेंघा रोग के लक्षण – Goiters Symptoms in hindi

घेंघा रोग के लक्षण - Goiters Symptoms in hindi

सभी प्रकार के घेंघा रोग की स्थिति में लक्षण या संकेत उत्पन्न नहीं होते हैं। एक गण्डमाला या घेंघा रोग का प्रारंभिक लक्षण गर्दन में सूजन आना है। यदि थायरॉयड में गाठें (नोड्यूल) उत्पन्न होती हैं, तो वे आकार में बहुत छोटी या बहुत बड़ी हो सकती हैं। अतः थायरॉयड मे गांठ (नोड्यूल्स) की उपस्थिति गले की सूजन को बढ़ा सकती है। घेंघा रोग के लक्षणों में निम्न को शामिल किया जा सकता है, जैसे:

  • गले में खिंचाव का अनुभव होना
  • खाँसी आना
  • आवाज बैठ जाना या आवाज न निकलना
  • खाना निगलने में कठिनाई होना
  • सांस लेने मे तकलीफ महसूस होना
  • हाथ को सिर के ऊपर उठाते ही चक्कर आना
  • गर्दन को ऊपर उठाने या नीचे झुकाने में तकलीफ होना, इत्यादि।

यदि गण्डमाला या घेंघा रोग का, हाइपोथायरायडिज्म या हाइपरथायरायडिज्म के साथ संबंध है, तो इस स्थिति में निम्न प्रकार के लक्षण देखे जा सकते है, जैसे:

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घेंघा रोग (गण्डमाला) के कारण – Goiters Causes in hindi

घेंघा रोग (गण्डमाला) के कारण - Goiters Causes in hindi

गण्डमाला या घेंघा रोग से तात्पर्य केवल यह नहीं होता है, कि पीड़ित व्यक्ति की थायरॉयड ग्रंथि सामान्य रूप से कार्य नहीं कर रही है। जबकि घेंघा रोग की स्थिति में थायरॉयड में अधिक वृद्धि होने पर भी, थायराइड ग्रंथि सामान्य मात्रा में हार्मोन का उत्पादन कर सकती है। अनेक करणों से थायरॉयड ग्रंथि के आकार में वृद्धि हो सकती है, इन कारणों में शामिल हैं:

आयोडीन की कमी (Iodine deficiency)

आयोडीन, थायराइड हार्मोन के उत्पादन के लिए आवश्यक तत्व होता है, जो मुख्य रूप से समुद्री जल और तटीय क्षेत्रों की मिट्टी में पाया जाता है। आहार मे आयोडीन की कमी मुख्य रूप से घेंघा रोग का कारण बनती है। मानव शरीर में पर्याप्त आयोडीन की कमी होने के कारण थायरॉयड ग्रंथि को हार्मोन उत्पादन करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है, जिससे ग्रंथि बड़ी हो जाती है और गोइटर उत्पन्न करती है। जो लोग अंतर्देशीय (inland) या अधिक ऊंचाई पर रहते हैं, उनमें अक्सर आयोडीन की कमी पाई जाती है। हार्मोन-अवरोधक खाद्य पदार्थों जैसे गोभी, ब्रोकोली और फूलगोभी में अधिक आयोडीन की कमी के कारण गोइटर विकसित होने की संभवना बढ़ जाती है।

ग्रेव्स रोग (Graves disease)

ग्रेव्स रोग की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति का थायरॉयड सामान्य मात्रा से अधिक थायराइड हार्मोन का उत्पादन करने लगता है। अतः घेंघा रोग या गण्डमाला कभी-कभी थायरॉयड ग्रंथि द्वारा बहुत अधिक थायराइड हार्मोन के उत्पादन (हाइपरथायरायडिज्म) के कारण विकसित हो सकता है। ग्रेव्स रोग (Graves disease) में, पीड़ित व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा उत्पन्न एंटीबॉडीज़ गलती से थायरॉयड ग्रंथि पर हमला करने लगते हैं, और अतिरिक्त थायरोक्सिन हार्मोन के उत्पादन का कारण बनती है, जिसके परिणामस्वरूप थायरॉयड में सूजन आ जाती है।

हाशिमोटो की बीमारी (Hashimoto’s disease)

गण्डमाला या घेंघा रोग एक हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति के कारण भी विकसित हो सकता है। हाशिमोटो रोग एक स्व-प्रतिरक्षित विकार (autoimmune disorder) है। जिसमें व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं की थायराइड ग्रंथि पर हमला करती है और थायरॉयड को नुकसान पहुंचाती है जिससे बहुत कम थायरॉयड हार्मोन का उत्पादन होता है। अतः थायरॉयड हार्मोन का कम मात्रा में उत्पादन होने पर, पिट्यूटरी ग्रंथि अधिक मात्रा में थायराइड उत्तेजक हार्मोन (TSH) का उत्पादन करती है, जो थायरॉयड ग्रंथि के विस्तार का कारण बनता है।

थायरॉयड कैंसर (Thyroid cancer)

कैंसर की समस्या थायरॉयड को भी प्रभावित कर सकती है, जो ग्रंथि में सूजन का कारण बनती है। थायरॉयड कैंसर की समस्या थायरॉयड में नोड्यूल्स के उत्पादन की तरह आम नहीं होती है। थायरॉयड कैंसर नोड्यूल्स के रूप में भी विकसित हो सकता है, जिसका निर्धारण थायराइड नोड्यूल की बायोप्सी (biopsy) करने पर सटीकता से किया जा सकता है।

गर्भावस्था (Pregnancy)

महिलाओं के गर्भवती होने के साथ-साथ थायराइड के आकार में वृद्धि हो सकती है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में उत्पादित होने वाला हार्मोन (ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (HCG)) थायरॉयड ग्रंथि के बढ़ने का कारण बनता है।

सूजन (Inflammation)

थायराइडाइटिस (thyroiditis) एक सूजन-संबंधी स्थिति है, जो थायरॉयड में दर्द और सूजन का कारण बनती है। थायरॉयड में सूजन की स्थिति थायरोक्सिन हार्मोन के अधिक या कम मात्रा में उत्पादन होने का कारण भी बन सकती है, जिससे घेंघा रोग की स्थिति उत्पन्न होती है।

नोड्यूल्स (nodules)

ठोस या तरल पदार्थ युक्त अल्सर (cysts) या गांठ थायरॉयड में विकसित हो सकती है और सूजन का कारण बन सकती है। ये नोड्यूल कैंसरमुक्त या सौम्य होते हैं, जो समान्यतः घेंघा रोग का कारण बनते है।

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घेंघा रोग (गोइटर) का निदान – Goiters Diagnosis in hindi

घेंघा रोग (गोइटर) का निदान - Goiters Diagnosis in hindi

घेंघा रोग के निदान के लिए डॉक्टर गर्दन की जांच कर सकता है। घेंघा रोग की स्थिति में अनेक प्रकार के नैदानिक परीक्षणों की सिफ़ारिश की जा सकती है, जिनमें शामिल हैं:

  • रक्त परीक्षण (Blood Tests) – एक रक्त परीक्षण की मदद से हार्मोन के स्तर में परिवर्तन और एंटीबॉडी के उत्पादन में वृद्धि का भी पता लगा जा सकता है, जो एक संक्रमण, चोट या कैंसर की स्थिति में उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त रक्त परीक्षण की मदद से थायरॉयड-उत्तेजक हार्मोन (TSH) के स्तर की भी जांच की जा सकती है।
  • थायराइड स्कैन (Thyroid Scan) – डॉक्टर थायरॉयड स्कैन की मदद से घेंघा रोग का निदान कर सकते हैं। स्कैन के माध्यम से गोइटर के आकार और स्थिति का पता लगया जा सकता हैं। एक थायरॉइड स्कैन के दौरान, कोहनी (elbow) की नसों में एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप इंजेक्शन लगाया जाता है। इसके बाद मरीज को एक विशेष प्रकार की टेबल पर लेटा दिया जाता हैं। जिसमें एक कैमरा के माध्यम से कंप्यूटर स्क्रीन पर थायरॉयड की इमेज प्राप्त की जाती है। इस प्रक्रिया में लगने वाला समय प्रत्येक मरीज के लिए अलग-अलग हो सकता है, जो कि आइसोटोप को थायरॉयड ग्रंथि तक पहुंचने की स्थिति पर निर्भर करता है।
  • अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) – अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्दन मे गोइटर के आकार और नोड्यूल की छवियों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया मे एक छड़ी जैसी डिवाइस (transducer) को गर्दन के ऊपर रखा जाता है, तथा ध्वनि तरंगों के माध्यम से कंप्यूटर स्क्रीन पर गर्दन और थायरॉयड ग्रंथि के आकार को देखने के लिए छवियों को प्राप्त किया जाता है। अल्ट्रासाउंड के अतिरिक्त घेंघा रोग के निदान के लिए अन्य इमेजिंग परीक्षण के तहत सीटी स्कैन, चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (एमआरआई) का भी प्रयोग किया जा सकता है
  • बायोप्सी (Biopsy) – घेंघा रोग की स्थिति का निदान करने के लिए बायोप्सी परीक्षण के तहत थायरॉयड ऊतको के छोटे से नमूने को प्राप्त कर प्रयोगशाला विश्लेषण के लिए भेजा जाता है। इस परीक्षण में नमूना एकत्रित करने के लिए अल्ट्रासाउंड का भी उपयोग किया जा सकता है।

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घेंघा रोग के जोखिम कारक – Goiters Risk factor in hindi

घेंघा रोग के जोखिम कारक - Goiters Risk factor in hindi

गण्डमाला या घेंघा रोग (गोइटर) का कारण बनने वाले जोखिम कारकों में निम्न को शामिल किया जा सकता है, जैसे:

  • थायराइड कैंसर,
  • नोड्यूल्स और थायराइड से संबन्धित समस्याओं का पारिवारिक इतिहास
  • आहार के माध्यम से अधिक नमक या आयोडीन का सेवन करने पर
  • महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा घेंघा रोग होने का खतरा अधिक होता है
  • 40 वर्ष से अधिक आयु का होना थायरॉयड के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है
  • गर्भवती या रजोनिवृत्ति की स्थिति थायरॉयड में समस्यओं के जोखिम को बढ़ा सकती है
  • गर्दन या छाती से संबन्धित विकिरण चिकित्सा प्राप्त करने की स्थिति में घेंघा रोग हो सकता है। विकिरण चिकित्सा पीड़ित व्यक्ति के थायरॉयड कार्यों में बदलाव उत्पन्न कर सकती है।

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घेंघा रोग का इलाज – Goiters Treatment in hindi

घेंघा रोग का इलाज - Goiters Treatment in hindi

घेंघा रोग का इलाज थायरॉयड के आकार और रोग की स्थिति और इसके लक्षणों के आधार पर किया जा सकता है। गण्डमाला या घेंघा रोग के उपचार में योगदान देने वाली प्रक्रियाओं में निम्न को शामिल किया जा सकता है।

  • दवाएं (Medications) – यदि हाइपोथायरायडिज्म या हाइपरथायरायडिज्म की समस्या के कारण घेंघा रोग उत्पन्न होता है, तो डॉक्टर हार्मोन के स्तर को सामान्य करने के लिए कुछ दवाओं की सिफ़ारिश कर सकते हैं। ये दवाएं गण्डमाला या गोइटर को सिकोड़ने में योगदान देती हैं। यदि घेंघा रोग का कारण थायरॉइडाइटिस की स्थिति है, तो डॉक्टर इस समस्या का इलाज करने के लिए सूजन कम करने वाली दवाओं (एस्पिरिन या कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स) की सिफ़ारिश कर सकता है। लेवोथायरोक्सिन (लेवोक्सिल, सिन्थ्रोइड, टिरोसिन्ट) दवाएं हाइपोथायरायडिज्म के लक्षणों को कम करने के साथ-साथ थायरॉयड-उत्तेजक हार्मोन की रिहाई को धीमा करने में मदद कर सकती हैं।
  • सर्जरी (Surgeries) – सर्जरी (Surgeries) के तहत थायरॉयड ग्रंथि के कुछ हिस्सों को हटाना शामिल है, जिसे थायरॉयडेक्टॉमी (thyroidectomy) के रूप में जाना जाता है घेंघा रोग की स्थिति में डॉक्टर द्वारा सर्जरी की सिफ़ारिश तब की जाती है, जब थायरॉयड का आकार बहुत अधिक बढ़ जाता है तथा सांस लेने या निगलने में कठिनाई पैदा होती है। इसके साथ ही दवाओं द्वारा किए गया इलाज अप्रभावी होने की स्थिति में भी थायरॉयडेक्टॉमी का प्रयोग किया जा सकता है।
  • रेडियोधर्मी आयोडीन (Radioactive Iodine) – विषैले बहुकोशिकीय गोइटर (toxic multinodular goiters) के इलाज के लिए रेडियोएक्टिव आयोडीन (RAI) आवश्यक हो सकता है। डॉक्टर द्वारा रोगी को रेडियोएक्टिव आयोडीन (RAI) की निश्चित मात्रा को निगलने की सिफ़ारिश की जाती है, यह रेडियोएक्टिव आयोडीन रक्त के माध्यम से थायरॉयड तक पहुचता है, और अतिरिक्त ऊतक को नष्ट कर देता है।

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घेंघा रोग के लिए घरेलू देखभाल – Goiters Home Care in Hindi

घेंघा रोग के लिए घरेलू देखभाल - Goiters Home Care in hindi

गण्डमाला के प्रकार के आधार पर, घर पर आयोडीन का सेवन को बढ़ाने या घटाने की आवश्यकता पड़ सकती है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 150 माइक्रोग्राम आयोडीन की आवश्यकता होती है। यदि एक गण्डमाला छोटा है और किसी भी समस्या का कारण नहीं बनता है, तो इसके लिए किसी भी उपचार की आवश्यकता नहीं होती है, इसके लिए घर पर देखभाल जरूरी होती है। घरेलू देखभाल के तहत निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे:

  • भोजन में आयोडीन युक्त नमक का उपयोग करें।
  • समुद्री भोजन या समुद्री शैवाल (seaweed) का सेवन करें।
  • झींगा (Shrimp) और अन्य शेलफिश (shellfish) मछली का सेवन करें।
  • यदि अत्यादिक आयोडीन के कारण घेंघा रोग उत्पन्न होता है, तो आयोडीन-फोर्टिफाइड नमक, शेलफिश (shellfish), समुद्री शैवाल (seaweed) और आयोडीन सप्लीमेंट का सेवन करने से बचें।

(और पढ़े – संतुलित आहार के लिए जरूरी तत्व , जिसे अपनाकर आप रोंगों से बच पाएंगे…)

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