पित्त दोष क्या है जाने असंतुलित पित्त से होने वाले रोग, लक्षण और उपाय – Pitta Dosha in Hindi
आयुर्वेदिक उपचार

पित्त दोष क्या है जाने असंतुलित पित्त से होने वाले रोग, लक्षण और उपाय – Pitta Dosha in Hindi

पित्त दोष क्या है जाने असंतुलित पित्त से होने वाले रोग, लक्षण और उपाय – Pitta Dosha in Hindi

पित्त दोष क्या होता है? पित्त शरीर में मौजूद एक दोष है जो शरीर में गर्मी, आग और ऊर्जा का प्रतिनिधित्‍व करता है। जैविक रूप से पित्त उर्जा और तरल का संयोजन है। इसमें मौजूद ऊर्जा सक्रिय सिद्धांत के रूप में कार्य करती है और तरल एक वाहन की भूमिका निभाता है। हमारे शरीर में सभी चयापचय प्रक्रियाएं पित्त तत्‍वों के कारण होती हैं। पित्त कफ अणुओं को आसानी से तोड़ सकता है और फिर से ऊर्जा का उत्‍पादन करने में मदद करता है। पित्त शब्‍द तप से लिया गया है। जिसका मतलब गर्मी, ऊर्जा या आग होता है। आज इस लेख में आप पित्त दोष (Pitta Dosha in Hindi) से संबंधित जानकारी प्राप्‍त करेगें। जिसमे आप पित्त दोष क्या है और असंतुलित पित्त से होने वाले रोग, लक्षण और उपाय के बारे में जानेगें।

विषय सूची

पित्त दोष का सिद्धांत – What is Pitta Constitution in Hindi

अग्नि ऊर्जा का प्रतिनिधित्‍व करती है जिसका स्‍थान वायु (VAYU) के बाद आता है। आमतौर पर यह शरीर में गर्माहट के द्वारा महसूस किया जा सकता है। हम सभी भोजन करने के बाद अपने शरीर में कुछ गर्माहट महसूस करते हैं और हमारे शरीर का तापमान कुछ बढ़ जाता है। क्‍योंकि इस दौरान हमारी चयापचय दर बढ़ी हुई होती है। आयुर्वेद के अनुसार ऐसा पित्त (PITTA) के कारण होता है। पित्त शरीर में पाचन और चयापचय प्रक्रिया में मदद करता है। हम यह कह सकते हैं पित्त के तत्‍व हमें ऊर्जा दिलाते हैं और इसमें मौजूद तरल पदार्थ वाहन के रूप में कार्य करता है जो ऊर्जा को सभी अंगों में पहुंचाने में सहायक हैं।

पित्त दोष के गुण क्‍या है – Pitta Dosha ke gun kya hai in Hindi

समान गुणों वाली चीजें या भोजन पित्त को बढ़ाते हैं, जबकि विपरीत लक्षण पित्त को शांत करते हैं।

  • इरशीता स्निग्ध (Irsheeta Snigadh) – थोड़ा चिपचिपा या तैलीय
  • ऊष्‍ण (USHANA) – गर्म
  • तीक्षण (TIKSHNA) – तेज या पेनेट्रेटिंग शक्ति
  • द्रव (DRAVA) – तरल या द्रव
  • चाल (CHALA) – मोबिलिटी

पित्त के कार्य क्‍या होते हैं – Pitta ke Karya kya hote hai in Hindi

पित्त के कार्य क्‍या होते हैं – Pitta ke Karya kya hote hai in Hindi

पित्त का मुख्‍य कार्य भोजन पाचन से शुरू होता है और इसे उपयोग के लिए ऊर्जा में परिवर्तित करता है। यह अपचय और जटिल अणुओं के टूटने को नियंत्रित करता है। इस प्रक्रिया के दौरान ऊर्जा भी निकलती है। इसके अलावा पित्त कफ द्वारा प्रेरित उपचय की भी जांच करता है।

पित्त के कार्य संक्षेप में इस प्रकार हैं :

  • पाचन (Digestion)
  • अपचय (Catabolism)
  • कोशिकीय गतिविधियां (Cellular activities)
  • मानसिक गतिविधियां (Mental activities)
  • विचारों को संसाधित करना और स्‍कैन करना (Processing and scanning various thoughts)
  • गर्मी की उत्‍पत्ति (Heat production)
  • रंजकता (Pigmentation)
  • लिक्विडिटी (Liquidity)
  • पित्त शरीर की गर्मी और तापमान के रखरखाव में एक भूमिका निभाता है।
  • यह भूख और प्‍यास के लिए जिम्‍मेदार होता है।
  • पित्त त्‍वचा के रंग और चमक को नियंत्रित करता है।
  • यह देखने की क्षमता को बनाए रखता है।
  • शरीर में पित्त का संतुलन पाचन शक्ति को बढ़ाने और सेलुलर गतिविधियों को बनाए रखता है। इसके अलावा यह संवेदी सूचना, विचार और अन्‍य मानसिक गतिविधियों को संसाधित करता है।

शरीर में पित्त के मुख्‍य स्‍थान कहां है – Where is the main place of Pitta in the body in Hindi

हालांकि पित्त शरीर में हर जगह मौजूद होता है। लेकिन आसानी से इसकी उपलब्‍धता को समझने के लिए आयुर्वेद में कुछ विशेष स्‍थानों का उल्‍लेख मिलता है। जिसके कारण पित्त विकारों का उपचार करने की दृष्टि विशेष महत्‍व है। हृदय और नाभि के बीच सभी हिस्‍सों को पित्त क्षेत्र माना जाता है।

  • पेट (Stomach)
  • छोटी आंत (Small Intestine)
  • अग्न्याशय (Pancreas)
  • जिगर (Liver)
  • तिल्‍ली (Spleen)
  • रक्‍त (Blood)
  • आंखें (Eyes)
  • त्‍वचा में पसीने की ग्रंथियां (Sweat Glands in the skin)

(और पढ़े – मानव पाचन तंत्र कैसा होता है, और कैसे इसे मजबूत बनायें…)

पित्त (पिट्टा) के प्रकार क्‍या हैं – Pitta ke prakar kya hai in Hindi

सामान्‍य रूप से पित्त के 5 प्रकार होते हैं जो इस प्रकार हैं :

  • पचाका पित्त (PACHAKA PITTA)
  • रंजक पित्त (RANJAKA PITTA)
  • साधक पिट्टा (Sadhaka Pitta)
  • आलोचक पिट्टा (ALOCHAKA PITTA)
  • भ्राजक पित्त (BHARAJAKA PITTA)

पचाक पित्त क्‍या है – What is PACHAKA PITTA in Hindi

पाचक पित्त भोजन को पचाने में अहम भूमिका निभाता है। जिसका विशेष रूप से जठरांत्र संबंधी मार्ग में आगे उपयोग किया जाता है उसे पाचक पित्त (PACAHAKA PITTA) कहा जाता है। पचाक का मतलब है जो शरीर में पाचन और चयापचय में मदद करता है। यह भोजन को तोड़ने और शरीर के लिए पोषक तत्‍वों को निकालने में भूमिका निभाता है। अन्‍य प्रकार के पित्त की तुलना में इसमें द्रव (DRAVA) गुणवत्ता कम होती है लेकिन इसमें उष्ण (USHNA) गुणवत्ता अधिक होती है। इसलिए आयुर्वेद में पित्त को पाचन अग्नी (AGNI) भी कहा जाता है।

पाचक पित्त का शरीर में स्‍थान

जठरांत्र संबंधी मार्ग (पेट, ग्रहणी और छोटी आंत) ये सभी अंग पाचक पित्त (PACHAKA PITTA) के मुख्‍य स्‍थान हैं। पाचन रस और लगभग सभी एंजाइमों को इसका हिस्‍सा माना जाता है।

पाचक पित्त के कार्य

पाचक पित्त (PACHAKA PITTA) के सामान्‍य कार्यों में भोजन का पाचन के साथ ही भोजन के उपयोगी भाग और अपशिष्‍ट भाग को अलग करना है।

पाचक पित्त बढ़ने के कारण होने वाले रोग

पाचक पित्त के शरीर में असंतुलन होने के कारण कई बीमारियां हो सकती हैं। पाचन पित्त की शरीर में कमी आने के कारण निम्‍न समस्‍याएं हो सकती हैं।

  • भूख कम लगना – यह पाचक रस के स्राव में कमी और पाचक पित्त के सभी गुणों में कमी के कारण होता है।
  • खट्टी डकार आना
  • अन्‍य पाचन संबंधी समस्‍याएं

शरीर में पाचन पित्त में वृद्धि होने पर निम्‍न समस्‍याएं हो सकती हैं।

  • भूख कम लगना – यह पेट में एसिड (पित्त) के बढ़ते स्राव के कारण होता है। जिससे भूख कम लगना, एनोरेक्सिया (anorexia), हार्टबर्न और गैस्‍ट्राइटिस जैसी समस्‍याएं होती हैं। आयुर्वेद में इसे पित्तज अग्निमध्‍यया (PITTAJ AGNIMADHYA) कहते हैं। इस प्रकार की भूख में कमी से पाचक पित्त की द्रव (DRAVA) गुणवत्ता बढ़ जाती है लेकिन उष्‍ण (USHNA) गुणवत्ता कम हो जाती है। जिसके परिणामस्‍वरूप कुपोषण और भूख कम हो जाती है।
  • भूख में वृद्धि – जब पाचक पित्त में द्रव गुणवत्ता का सामान्‍य स्‍तर होता है, लेकिन जब इसकी उष्‍ण (USHNA) गुणवत्ता बढ़ जाती है तब एक व्‍यक्ति की भूख में वृद्धि होती है। उसे बार-बार भूख लगती है और अन्‍य व्यक्ति की तुलना में उसका भोजन जल्‍दी पच जाता है।

(और पढ़े – भूख बढ़ाने के आयुर्वेदिक घरेलू उपाय…)

रंजक पित्त क्‍या है – What is RANJAKA PITTA in Hindi

रंजक पित्त जिगर, तिल्‍ली, पेट और छोटी आंत में मौजूद होता है। रंजक पित्त रक्त को लाल रंग प्रदान करता है और हीमोग्‍लोबिन संश्‍लेषण महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है।

रंजक पित्त का शरीर में स्‍थान

रंजक पित्त शरीर के कुछ विशेष हिस्‍सों में पाया जाता है जो इस प्रकार हैं :

  • जिगर (Liver)
  • तिल्‍ली (Spleen)
  • पेट (Stomach)
  • छोटी आंत (Small intestine)

रंजक पित्त के सामानय कार्य

रंजक पित्त के कुछ सामान्‍य कार्य होते हैं जो इस प्रकार हैं :

  • हीमोग्लोबिन संश्‍लेषण (Haemoglobin synthesis)
  • हीमोग्‍लोबिन के लिए लाल रंग उत्‍पन्‍न करना (Imparting red color to haemoglobin)

रंजक पित्त बढ़ने के कारण होने वाले रोग

शरीर में रंजक पित्त की मात्रा बढ़ने के कारण कई प्रकार की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं हो सकती हैं। उनमें से प्रमुख स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं इस प्रकार हैं।

साधक पित्त पित्त क्‍या है – What is SADHAKA PITTA in Hindi

साधक पित्त (SADHAKA PITTA) दिल और दिमाग में रहता है। यह न्‍यूरॉन में चयापचय गतिविधियों और सूचना विचार प्रक्रियाओं को संसाधित करने के लिए जिम्‍मेदार होता है।

शरीर में साधक पित्त का स्‍थान –

साधक पित्त शरीर में कुछ विशेष स्‍थानों पर मौजूद रहता है जो इस प्रकार हैं :

  • दिल (Heart) (चेस्ट)
  • मस्तिष्‍क और नसों (Brain & Nerves)

शरीर के लिए साधक पित्त के सामान्‍य कार्य

शरीर के लिए साधक पित्ता (SADHAKA PITTA) के कुछ विशेष कार्य हैं जो इस प्रकार हैं।

  • न्‍यूरॉन में मेटाबोलिक गतिविधियां (Metabolic activities in the neuron)
  • सूचना और विचार प्रक्रियाओं को संसाधित करना (Processing information and thought processes)
  • मन के कार्यों को बनाए रखना (Maintaining the functions of mind)
  • याद या मेमोरी संबंधी कार्य (Memory)
  • अहंकार, बुद्धि, क्रोध, खुशी, लगाव, भय और दृढ़ संकल्‍प जैसी कुछ भावनाएं साधक पित्ता के कारण होती हैं।

साधक पित्त बढ़ने के कारण होने वाले रोग

जब शरीर में साधक पित्त अधिक हो जाता है या असंतुलन होता है तब कुछ स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं हो सकती हैं। जैसे कि

  • स्‍मृति हानि (Memory impairment)
  • प्राकृतिक मानसिक कार्यों का बिगड़ना (Deterioration of natural mental functions)

(और पढ़े – भूलने की बीमारी के लक्षण कारण जांच इलाज और उपचार…)

आलोचक पित्त क्‍या है – What is ALOCHAKA PITTA in Hindi

आंखों में प्रकाश को पहचानने में मदद करने वाले पित्त को आलोचक पित्त (ALOCHAKA PITTA) कहा जाता है।

शरीर में आलोचक पित्त का स्‍थान

आलोचक पित्त मुख्‍य रूप से शरीर के कुछ विशेष हिस्‍सों में पाया जाता है जो इस प्रकार हैं :

आंखों में – रेटिना के छड़ और शंकु में चयापचय गतिविधियां आलोचक पित्त के कारण होती हैं।

आलोचक पित्त के सामान्‍य कार्य

आलोचक पित्त (ALOCHAKA PITTA) का मुख्‍य कार्य दृष्टि को बनाए रखना है। यह प्रकाश को आगे मस्तिष्‍क तक ले जाता है।

आलोचक पित्त बढ़ने के कारण होने वाले रोग

जब शरीर में आलोचक पित्त की मात्रा बढ़ जाती है तो आंखों संबंधी कुछ दुष्‍प्रभाव हो सकते हैं। यह मुख्‍य रूप से आंखों के विकार या दृष्टि में कमी का प्रमुख कारण माना जाता है।

भ्राजक पित्त क्‍या है – What is BHARAJAKA PITTA in Hindi

भ्राजक पित्त (BHARAJAKA PITTA) त्‍वचा के रंग के लिए जिम्‍मेदार पित्त है। इसके अलावा यह त्‍वचा को गर्म रखने में भी सहायक होता है।

शरीर में भ्राजक पित्त का स्‍थान

भ्राजक पित्त का शरीर में मुख्‍य स्‍थान त्वचा है।

भ्राजक पित्त के सामान्‍य कार्य

भ्राजक पित्त की मौजूदगी शरीर के लिए बहुत ही आवश्‍यक है। इस पित्त के कुछ सामान्‍य कार्य इस प्रकार हैं।

  • यह पित्त त्‍वचा को रंग प्रदान करता है।
  • त्‍वचा में गर्माहट बनाए रखता है।

भ्राजक पित्त बढ़ने के कारण होने वाले रोग

शरीर में भ्राजक पित्त की मात्रा के कारण विशेष रूप से त्वचा संबंधी समस्‍याएं होती हैं।

(और पढ़े – पेट में इन्फेक्शन के लक्षण, कारण, इलाज और बचाव…)

पित्त चक्र के अनुसार दवाएं लेना – Taking Medicines according to Pitta Cycle in Hindi

यह सिद्धांत तब लागू किया जाता है जब किसी व्‍यक्ति को पित्त विकार होता है। या पित्त के लक्षण पूरे शरीर या पेट में दिखाई देते हैं। पित्त से संबंधित समस्‍याओं को दूर करने के लिए दवाएं भोजन करने से पहले ली जानी चाहिए। भोजन करने से पहले दवाएं उस दौरान ली जानी चाहिए जब आपको गैस्‍ट्राइटिस, पेट की खराबी और अपच जैसी समस्‍याएं हों।

पित्त को शांत करने वाली दवाएं सुबह, दोपहर और देर रात को भी ली जा सकती हैं। यदि कोई व्‍यक्ति सामान्‍य पित्त रोग से पीड़ित होता है तब।

पित्त और मौसम में क्‍या संबंध है – PITTA aur Season me kya sambandh hai in Hindi

पित्त रोग मौसम के अनुसार अपने प्रभाव दिखाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार बरसात में पित्त का संचय (PITTA CHAYA) होता है। पित्त की अधिकता (PITTA PRAKOPA) शीत ऋतु में होती है। जबक‍ि बढ़ी हुई पित्त का शमन (PITTA PRASHAMA) शुरुआती ग्रीष्‍म ऋतु (HEMANTA) में होता है। आइए जाने पित्त और मौसम के बीच क्‍या संबंध है।

वर्षा ऋतु और पित्त

ग्रीष्‍मकाल में गर्मी के कारण थकावट, शक्ति हानि और पाचन की आग में कमी आती है। जबकि बरसात के मौसम में गंदे पानी के कारण पाचन की आग और शरीर की ताकत कम हो जाती है। जिसके कारण अपच जैसी समस्‍याएं होती हैं। भोजन और पानी में अम्‍ल प्रमुख है। इन चीजों से पित्त का संचय होता है। इस प्रक्रिया को पित्त संचय (PITTA CHAYA) कहते हैं।

शरद ऋतु और पित्त

शरद ऋतु में गर्मी से संचित पित्त की वृद्धि होती है। इस चरण को पित्त प्रकोप (PITTA PRAKOPA) कहा जाता है।

हेमंत ऋतु और पित्त

इस मौसम के दौरान भोजन और पानी में मीठा स्‍वाद आ जाता है। इसके साथ ही मौसम और वातावरण में भी ठंडक हो जाती है। ये विशेषताएं स्‍वाभाविक रूप से पित्त के लक्षणों को कम करती हैं। इस चरण को पित्तप्रधान (PITTA PRASHAMA) कहा जाता है।

(और पढ़े – लीवर को मजबूत करने के लिए क्या खाना चाहिए…)

पित्त असंतुलन और इसके लक्षण – Pitta Imbalance and its Symptoms in Hindi

जब शरीर में पित्त का उचित संतुलन रहता है तब यह स्थिति स्‍वास्‍थ्‍य के लिए अच्‍छी मानी जाती है। लेकिन पित्त के स्‍तर में कमी या वृद्धि स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के होने को दर्शाता है। पित्त की कमी या वृद्धि को पित्त असंतुलन (Pitta Imbalance) कहा जाता है। पित्त के बढ़ने या कम होने पर दोनों के अलग-अलग लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं :

पित्त की कमी के लक्षण और स्‍वास्‍थ स्थितियां – Decreased Pitta Symptoms & Health Conditions in Hindi

जब किसी व्‍यक्ति को नीचे बताए गए लक्षण महसूस होते हैं तब इस स्थिति में पित्त की कमी को माना जाता है। ये लक्षण इस प्रकार हैं :

  • हाइपोथर्मिया (Hypothermia) – शरीर का कम तापमान ।
  • अक्‍लोरहाइड्रिया (Achlorhydria) – गैस्ट्रिक स्राव में हाइड्रोक्‍लोरिक एसिड (HCL) की अनुपस्थिति ।
  • हाइपोक्‍लोरहाइड्रिया (Hypochlorhydria) – गैस्ट्रिक स्राव में हाइड्रोक्‍लोरिक एसिड की अनुपस्थिति या उत्पादन में कमी ।

बढ़ी हुई पित्त के लक्षण और स्‍वास्‍थ्य स्थितियां – Increased Pitta Symptoms & Health Conditions in Hindi

किसी भी व्‍यक्ति निम्‍न लक्षण देखने पर यह कहा जा सकता है उसके शरीर में पित्त की वृद्धि हो रही है।

  • शांत शक्ति वाले भोजन करने की इच्‍छा होना
  • सामान्‍य कमजोरी (Generalized weakness)
  • उन्निद्रता (Sleeplessness)
  • होश खोने की भावना (Feeling of losing consciousness)
  • त्‍वचा का पीलापन या मलिनकिरण (Yellowish discoloration of the skin)
  • असामान्‍य रूप से पीले रंग का मल (Abnormally yellow colored stool)

बढ़े हुए पित्त के लक्षण

(और पढ़े – मुंह के स्वाद को ठीक करने के घरेलू उपाय…)

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